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Wednesday, July 25, 2012

इज़त सरजलिक : इस्तांबुल में मेरा पड़ाव

इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
इस्तांबुल में मेरा पड़ाव : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कई संस्करण हैं 
इस्तांबुल में मेरे पड़ाव के. 

एक के अनुसार,  
वह संदिग्ध राजनीतिक किस्म का पड़ाव था. 

एक अन्य के अनुसार, 
उसका ताल्लुक मेरे रूमानी उपन्यासों से था.  

तीसरे संस्करण में तो, 
नशीली दवाओं की फरोख्त तक का जिक्र है. 

निस्संदेह, किसी की रूचि इस तथ्य में नहीं 
कि मैं कभी इस्तांबुल नहीं गया. 
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Tuesday, July 24, 2012

इज़त सरजलिक : मेरे जख्मी होने के बाद

बोस्नियाई कवि इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
मेरे जख्मी होने के बाद : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

उस रात मैंने सपना देखा 
कि स्लोबोदान मारकोविक आए मेरे पास, 
मेरे जख्मों की खातिर माफी मांगने के वास्ते. 

किसी सर्ब की तरफ से अभी तक का 
इकलौता माफीनामा है वह. 

और वह आया एक सपने में, 
वह भी एक मृत कवि की तरफ से. 
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Monday, July 16, 2012

इज़त सरजलिक : उसकी सड़क

इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
उसकी सड़क : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वह भी सपने सजाता था चौरस हुई घास के, 
स्त्रियों के खुले हुए ब्लाउजों के. 
नौजवान था वह. 
भरोसा नहीं था उसे अगले जन्म में 
अभी सिर्फ अठ्ठारह की उम्र थी उसकी. 

तुमने नहीं देखा था 
जब समय बदल रहा था उसके चेहरे को. 
तुम जानते हो सिर्फ उसकी शोहरत के बारे में.  

मगर मैं तबसे उसे जानता था 
जब पुराने इंजनों और पटरों से 
उसने बनाया था एक हवाईजहाज जो उड़ नहीं पाया कभी.  

जब उसने बताया था अपने पिता से 
कि उनकी लड़ाई में हारना ही होगा किसी न किसी को, 

जब दो गिरफ्तारियों के बीच उसने पूछा था अपनी माँ से 
माँ, क्या तुम प्यार करती हो मुझसे? 

और उनकी धुंधलाई आँखों के ऊपर से बहुत देर तक 
वह निहारता रहा था सड़क को, 
वही सड़क 
जो अब उसके नाम पर है. 
                                                                     (1963) 
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Saturday, July 14, 2012

इज़त सरजलिक : दूरी बनाकर रखने का सिद्धांत

बोस्नियाई कवि इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
दूरी बनाकर रखने का सिद्धांत : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

दूरी बनाकर रखने का सिद्धांत 
खोजा गया था पश्च-लेखों के लेखकों द्वारा, 
उन लोगों द्वारा जो कुछ भी नहीं लगाना चाहते दांव पर. 

मैं खुद उन लोगों में से हूँ 
जो मानते हैं कि 
सोमवार को आपको बात करनी होगी सोमवार की, 
क्योंकि मंगलवार तक, बहुत देर हो चुकी हो शायद. 

सच है, बहुत मुश्किल होता है 
बैठकर कविताएँ लिखना कोठरी में, 
जब मोर्टार फट रहे हों आपकी खोपड़ी के ऊपर. 

सिर्फ कविताएँ न लिखना ही मुश्किल होता है उससे ज्यादा.  
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Saturday, July 7, 2012

इज़त सरजलिक : सरायेवो में किस्मत

इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
सरायेवो में किस्मत : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

सब कुछ मुमकिन है 
सरायेवो की 
१९९२ की बसंत ऋतु में: 

कि आप खड़े हों एक कतार में 
ब्रेड खरीदने के लिए
और पहुँच जाएं किसी इमरजेंसी वार्ड में 
अपनी टाँगे कटवाए हुए. 

और तब भी कह सकें 
कि किस्मतवाले रहे आप. 
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Friday, July 6, 2012

इज़त सरजलिक : हाथ

इज़त सरजलिक की एक और कविता...   

 
हाथ : इज़त सरजलिक 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

पांच लम्बे बरसों तक 
एक राइफल का कुंदा थामे रहा यह 
हाथ एक फ़ौजी का. 

इसका काम था 
मार डालना एक प्यारे कुत्ते को: 
हाथ एक शिकारी का. 

अपनी पूरी ज़िंदगी 
यह बरसाता रहा मुक्के: 
एक मुक्केबाज का हाथ. 

अपनी पूरी ज़िंदगी 
एक गिलास थामे रहा यह:  
एक पियक्कड़ का हाथ. 

और यह रहा एक खुशकिस्मत हाथ 
पिछले बीस बरसों से 
यह दुलारता रहा है तुम्हें. 

यह रहा खुशकिस्मत हाथ! 
                                (1968)
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Tuesday, July 3, 2012

बोस्निया से दो कविताएँ

दार्शनिक, निबंधकार, अनुवादक एवं कवि इज़त सरजलिक का जन्म १६ मार्च १९३० को बोस्निया एवं हर्जोगोविना के दोबोज में हुआ था. १९४५ में वे सरायेवो चले गए और फिर जीवन भर वहीं रहे. उनके ३० कविता-संग्रह प्रकाशित हैं और कविताओं का अनुवाद १५ भाषाओं में हो चुका है. वे खुद को इस कदर बीसवीं सदी का मानते थे कि इक्कीसवीं सदी आ जाने के बाद भी दोस्तों के साथ खतोकिताबत में साल का ज़िक्र १९९९+१, १९९९+२ के रूप में किया करते थे.  २ मई २००२ को उनकी मृत्यु हो गई. फिलहाल उनकी दो कविताएँ पढ़िए...   

 
इज़त सरजलिक की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

हमारी जिंदगियों में युद्ध

दो बाल्कन और दो विश्व युद्धों को 
देखा है मार्को बसिक ने अपनी ज़िंदगी में. 
यह पांचवां है उसका. 

मेरी और मेरी संतान के लिए -- दूसरा. 

और जहां तक व्लादिमिर की बात है 
अठ्ठारह महीने की उसकी उम्र को देखते हुए 
फिलहाल यह कहा जा सकता है 
कि अपनी आधी ज़िंदगी 
वह गुजार चुका है युद्ध में.  
            :: :: :: 

पूर्व-यूगोस्लाविया के अपने दोस्तों से 

यह क्या है, जो आ पड़ा हम पर, 
मेरे दोस्तों?  

मुझे नहीं पता 
कि क्या कर रहे हो तुम. 

क्या लिख रहे हो. 

पी रहे हो किसके साथ. 

पढ़ रहे हो कौन सी किताबें. 

अब तो यह भी नहीं पता, 
कि क्या अब भी हैं हम दोस्त. 
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