फिलिस्तीनी कवि ताहा मुहम्मद अली का एक क़सीदा...
सपना : ताहा मुहम्मद अली
(अनुवाद : मनोज पटेल)
कभी
तुम्हें बिछड़ते देखता हूँ
सपने में,
और दुख से भर आता है
मेरा गला,
और चूंकि सिर्फ सपना ही था वह,
इसलिए जागने पर
भर उठता हूँ सुख से...
और गेहूं के खेतों से गुलजार रहता है दिन.
और तुम ही थीं वह दुख,
और तुम ही थीं वह सुख.
मगर अब...
सपना देखता हूँ कि आ रही हो तुम
और सुख से सराबोर हो जाता हूँ मैं,
और जागने पर पाता हूँ
सिर्फ सपना ही था वह,
और उमड़ आता है दुख
मेरे गले में,
और काँटों से ढँक उठती है शाम.
20.08.1988
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