Tuesday, June 5, 2012

ताहा मुहम्मद अली : सपना

फिलिस्तीनी कवि ताहा मुहम्मद अली का एक क़सीदा...   

 
सपना : ताहा मुहम्मद अली 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कभी 
तुम्हें बिछड़ते देखता हूँ 
सपने में, 
और दुख से भर आता है 
मेरा गला, 
और चूंकि सिर्फ सपना ही था वह, 
इसलिए जागने पर 
भर उठता हूँ सुख से... 
और गेहूं के खेतों से गुलजार रहता है दिन. 
और तुम ही थीं वह दुख, 
और तुम ही थीं वह सुख. 

मगर अब... 
सपना देखता हूँ कि आ रही हो तुम 
और सुख से सराबोर हो जाता हूँ मैं, 
और जागने पर पाता हूँ 
सिर्फ सपना ही था वह, 
और उमड़ आता है दुख 
मेरे गले में, 
और काँटों से ढँक उठती है शाम. 
                                              20.08.1988 
               :: :: ::  

Monday, June 4, 2012

एवा लिप्सका की कविता

पोलिश कवियत्री एवा लिप्सका की एक कविता...   

 
प्रतिनिधि : एवा लिप्सका 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

इस तरह लिखना कि 
भिखारी स्वीकार कर लें उसे पैसे की जगह. 

और जन्म की जगह स्वीकार कर लें उसे 
मरते हुए लोग.  
               :: :: :: 

जैक एग्यूरो : भाड़े पर नन

जैक एग्यूरो की कविता...   

 
प्रार्थना : भाड़े पर नन : जैक एग्यूरो 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

प्रभु, 
मैं एक नन ले सकता हूँ भाड़े पर. 

सौ अमेरिकी डालरों के बदले 
एक नन मिल सकती है मुझे 
जो साल भर प्रार्थना करेगी मेरे लिए. 

प्रभु, एक नन के मेरे पक्ष में आ जाने से 
मैं वो सारी चीजें पा सकता हूँ जो पाना चाहता था -- 
वह ख़ास स्त्री जिसका इंतज़ार रहा है मुझे,  
एक बिल्ली जो मुझे खरोंचे नहीं और मुझे छींक न आए जिसकी वजह से, 
एक वेतनवृद्धि, खुल जाने वाला एक टिकट लाटरी का. 

मगर भगवन, 
यदि यह कारगर न साबित हुआ, 
और सुनी नहीं गईं मेरी प्रार्थनाएं, 
उपभोक्ता धोखाधड़ी का मामला देखने वाला फ़रिश्ता कौन है? 
                    :: :: :: 
स्रोत: लास एंजिल्स, १६ फरवरी १९९७ की डेटलाइन के साथ  El Diariol La Prensa की एक खबर. 
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