Saturday, June 9, 2012

ऊलाव हाउगे : बीज

उलाव हाउगे की एक और कविता...   

 
बीज : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

कोई जगह नहीं उगाने के लिए इसे. 
जड़ें मत निकालना, 
मत खिलाना फूल! 
यदि बचाना चाहते हो अपनी ज़िंदगी 
सख्त बने रहना और साबुत! 
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Friday, June 8, 2012

ऊलाव हाउगे : समुद्र तट पर

ऊलाव हाउगे की एक और कविता...  

 
समुद्र तट पर : ऊलाव हाउगे 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

उसने कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि अपनी पीठ फेर ली तुम्हारी ओर -- और 
चली गई. 
और हवा ने और बादलों ने, हाँ समुद्र तक ने फेर ली 
अपनी काली पड़ती पीठ; डुबकी लगा लिया तट पर पड़े पत्थरों ने, 
हरेक लहर, हरेक तिनका निकल भागा  
किसी और तट के लिए. 
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Thursday, June 7, 2012

डब्लू. एस. मर्विन : गवाह

डब्लू एस मर्विन की एक और कविता...   

 
गवाह : डब्लू. एस. मर्विन 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं बताना चाहता हूँ 
कि किस तरह के होते थे जंगल. 

मुझे बोलना होगा 
एक विस्मृत भाषा में. 
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