Sunday, June 16, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
नहीं देखा होगा तुमने अपने आपको छत से लगे हुए आईने में 
सुर्ख़ पत्तों से भरे एक दरख़्त के नीचे 

नहीं बढ़ाई होंगी तुमने अपनी उंगलियाँ 
दरख़्त से पत्ते और अपने बदन से लिबास उतारने के लिए 

"आदमी दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने तुम्हें चूमकर 
दरख़्त को टुकड़े टुकड़े करने के बाद 

नहीं उठाया होगा तुमने लकड़ी का गट्ठर 
नहीं जाना होगा तुमने कटी हुई शाख़ में पानी का वजन 

"आग दरख़्त से ज्यादा ख़ूबसूरत है" 
नहीं कहा होगा किसी ने अलाव के क़रीब तुम्हें अपने सीने से लगाकर 

नहीं दिया होगा तुम्हें किसी ने अपना दिल 
सुर्ख़ पत्तों का एक दरख़्त 
                     :: :: ::

Wednesday, June 12, 2013

अफ़ज़ाल अहमद सैयद : मेरे पार्लर में क़दम रखो

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की एक और कविता...   
मेरे पार्लर में क़दम रखो : अफ़ज़ाल अहमद सैयद 
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल) 
 
मेरे पार्लर में क़दम रखो 
मौत मुझे कहती है 

उसके बदन में 
मैं अपनी महबूबाओं को 
बरहना देखता हूँ 
उसकी रान पर बहते हुए 
अपने इंज़ाल को पहचान लेता हूँ 
उसको मेरी उस नज्म का हमल है 
जो मैं नहीं कह सका 
उसको एक जाल का हमल है 
जिससे मैं एक सितारा पकड़ना चाहता था 

मेरे पार्लर में क़दम रखो 
मौत मुझे कहती है 
और नहीं जानती 
अब मेरे पास उसे देने के लिए कुछ नहीं 
                :: :: :: 

बरहना  :  नग्न 
रान  :  जाँघ 
इंज़ाल  :  वीर्य 
हमल  :  गर्भ 

Saturday, June 8, 2013

मार्क स्ट्रैंड की कविता

मार्क स्ट्रैंड की एक और कविता... 

यहाँ से तुम हमेशा वहाँ पहुँच सकते हो  :  मार्क स्ट्रैंड  
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

एक मुसाफ़िर उस देश को लौटा जहाँ से कई साल पहले वह निकला था. जहाज से बाहर कदम रखते ही उसने गौर किया कि सब कुछ कितना अलग था. कभी वहाँ तमाम इमारतें हुआ करती थीं मगर अब बहुत कम रह गई थीं और उनमें से हर एक को मरम्मत की दरकार थी. उस पार्क में जहाँ वह बचपन में खेला करता था, धूल से भरी धूप की छड़ें पेड़ों की पीली पत्तियों और पौधों से बनाई गईं कुम्हलाई बाड़ों से टकरा रही थीं. कचरे की खाली थैलियां घास में बिखरी हुई थीं. हवा भारी थी. वह एक बेंच पर बैठ गया और अपने बगल बैठी औरत से बताने लगा कि वह काफी समय से बाहर था, और पूछा कि वह किस मौसम में लौट कर आया है. औरत ने जवाब दिया कि यही एक ही बचा था, वही जिस पर वे सभी राजी हुए थे. 
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