Friday, January 20, 2012

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ

जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ... 









जिबिग्न्यु हर्बर्ट की तीन गद्य कविताएँ
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

शहजादी 

शहजादी को जो बात सबसे ज्यादा पसंद है, वह है मुंह के बल फर्श पर लेट जाना. फर्श से धूल, मोम और खुदा जाने किस-किस चीज की गंध आती रहती है. शहजादी दरारों में अपना खजाना छुपाया करती है -- एक लाल मूंगे की माला, चांदी की एक लड़ी, इसके अलावा कुछ और जो मैं आपको बता नहीं सकता क्योंकि मैनें एक कसम खाई है. 
                                                            :: :: :: 

शराबी 

शराबी ऐसे लोग होते हैं जो एक घूँट में ही तलछट तक पी जाते हैं. मगर वे झिझकते इसलिए हैं क्योंकि तलछट में वे फिर से खुद को देख लेते हैं. बोतल के कांच से वे बहुत दूर के ग्रहों को देखते हैं. यदि वे थोड़ा मजबूत खोपड़ी  और थोड़ा बेहतर रूचि वाले होते, तो वे खगोलशास्त्री होते. 
                                                            :: :: :: 

बौने 

बौने जंगल में उगते हैं. उनकी एक ख़ास गंध और सफ़ेद दाढ़ी होती है. वे अकेले दिखाई पड़ते हैं. यदि उनका कोई झुण्ड इकट्ठा किया जा सके और सुखाकर दरवाजे पर लटकाया जा सके तो हमें कुछ सुकून हासिल हो सकता है. 
                                                            :: :: :: 
Manoj Patel, parteparte, parhteparhte, padtepadte  ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

Thursday, January 19, 2012

निकानोर पार्रा : सम्पूर्ण या उसका अंश

निकानोर पार्रा की एक कविता... 

 

निकानोर पार्रा की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल)

खेलों को मैनें त्यागा धर्म के लिए 
(हर इतवार को मैं प्रार्थना सभा में जाता था)
धर्म को छोड़ा कला के लिए 
और कला को गणितीय विज्ञान की खातिर 

जब तक कि आखिरकार ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो गई 

और अब मैं महज एक दर्शक हूँ, जिसकी  
सम्पूर्ण या उसके किसी अंश में श्रद्धा नहीं रही.  
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Manoj Patel, Tamsa Marg, Akbarpur, Ambedkarnagar, Mobile : 09838599333 

Wednesday, January 18, 2012

राबर्टो जुअर्रोज़ : इस तरह जन्म होता है एकांत का

राबर्टो जुअर्रोज़ की 'फिफ्थ वर्टिकल पोएट्री' से एक कविता...

 
राबर्टो जुअर्रोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

दिन की रिक्तता  
एक बिंदु में घनीभूत होकर 
चू पड़ती है नदी में 
एक बूँद की तरह. 

दिन की परिपूर्णता 
एक सूक्ष्म विवर में घनीभूत होकर 
खींच लेती है उस बूँद को 
नदी से बाहर. 

किस परिपूर्णता से किस रिक्तता की ओर 
या किस रिक्तता से किस परिपूर्णता की ओर 
बह रही है नदी?

सफ़ेद छत पर 
एक छोटी सी लकीर खींचती है आँख. 
छत स्वीकार कर लेती है आँख के इस भ्रम को 
और काली पड़ जाती है. 
उसके बाद लकीर मिटा लेती है खुद को 
और आँख बंद हो जाती है. 

इस तरह जन्म होता है एकांत का. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel, Parte Parte, Parhte Parhte, Padte Padte 
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