Sunday, January 15, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : दो टुकड़ों में काट दें यह दुनिया

लैंग्स्टन ह्यूज की एक और कविता...

 

थक चुका हूँ : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं तो थक चुका हूँ इंतज़ार करते-करते, 
क्या तुम नहीं थके इस इंतज़ार में 
कि एक दिन हो जाएगी यह दुनिया 
खूबसूरत, बेहतर और मेहरबान?
आओ एक चाकू उठाकर 
दो टुकड़ों में काट दें यह दुनिया -- 
और देखें कि कौन से कीड़े 
खाए जा रहे हैं इसे. 
               :: :: ::   
Manoj Patel, 09838599333 

3 comments:

  1. yah pahle se bahut tukdon me kati hui hai ab aur kitna katenge?agar khubsurt banane ke liye katna hirasta hai to jitni jaldi kate utna achha.bahut shandar kavita mitron se sanjha karne ke liye dhanyavad.

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  2. बहुत अच्छी कविता ,सुन्दर अनुवाद ! आभार मनोज जी !

    ":कीड़ों की तलाश में इस धरती को काटने के पहले देख तो लें ,कहीं कीड़े अपना चाकू तो नहीं चट कर गए !"

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