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Sunday, July 1, 2012

यानिस रित्सोस की कविता

यानिस रित्सोस की एक और कविता...   

 
जड़ता : यानिस रित्सोस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

अकेला बैठा था वह कमरे के अँधेरे में सिगरेट पीता हुआ. 
कुछ भी दिख नहीं रहा था. केवल उसके सिगरेट की चमक 
धीरे-धीरे हरकत करती थी यदा-कदा, सावधानीपूर्वक, 
जैसे वह कुछ खिला रहा हो किसी बीमार लड़की को 
चांदी के एक चम्मच से, या जैसे इलाज कर रहा हो 
किसी सितारे के जख्म का एक छोटे से नश्तर से. 
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Tuesday, June 19, 2012

यानिस रित्सोस की दो कविताएँ

यानिस रित्सोस की दो कविताएँ...   

 
यानिस रित्सोस की दो कविताएँ 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

रूई के फाहे 
जख्म के लिए नहीं -- 
जबकि 
रोशन होती जा रही शाम -- 
मुंह के लिए 
कानों के लिए 
आँखों के लिए. 
                     एथेंस, १८ जनवरी १९७८ 
     :: :: ::  

संगमरमर 
जो रचता है बुत को 
और जो 
बुत नहीं है 
और जो बचा है 
पहाड़ों में छिपा हुआ दूर तक 
मुझे राय दी गई 
उसे प्रकट न करने की, बस 
उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि कैसे. 
                     एथेंस, १८ जनवरी १९७८ 
     :: :: ::      

Friday, June 1, 2012

यानिस रित्सोस की कविता

यानिस रित्सोस की एक कविता...  

 
अदला-बदली : यानिस रित्सोस 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

वे हल को ले गए खेत में 
और घर में ले आए खेत को -- 
एक अंतहीन अदला-बदली ने आकार दिया 
चीजों के मायने को. 

स्त्री ने जगह बदल लिया अबाबील से, 
वह कूजने लगी छत पर लगे अबाबील के घोंसले में बैठकर. 
अबाबील बैठी स्त्री के करघे पर और बुनने लगी 
सितारे, पंछी, फूल, नौकाएं, और मछली. 

अगर तुम जान भर पाती कि कितना सुन्दर है तुम्हारा मुंह 
तुम चूमती मेरी आँखें कि मैं देख न पाऊँ तुम्हें. 
                                                            जुलाई १९५५ 
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Tuesday, May 22, 2012

यानिस रित्सोस : कर्त्तव्य

महान यूनानी कवि  यानिस रित्सोस  की एक कविता...  

 
कर्त्तव्य : यानिस रित्सोस 
(अनुवाद  :  मनोज पटेल) 

सांझ के झुटपुटे में टिमटिमाता है एक सितारा 
किसी कुंजी के रोशन छेद की तरह 
तुम अपनी आँखें चिपका लेते हो उस पर -- भीतर नजर डालते हो -- हर चीज देखते हो तुम 
पूरी तरह रोशन है दुनिया बंद दरवाजे के पीछे 
तुम्हें उसे खोलने की जरूरत है 
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