Wednesday, April 17, 2013

राबर्तो हुआरोज़ की कविता

राबर्तो हुआरोज़ की 'वर्टिकल पोएट्री' से एक और कविता... 

राबर्तो हुआरोज़ की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चीजें नक़ल उतारती हैं हमारी. 
हवा की गिरफ़्त में आया एक कागज़ 
पेश आता है किसी गिरते-पड़ते इंसान की तरह. 
आवाजें सीख जाती हैं बतियाना हमारे समान. 
हमारा आकार ग्रहण कर लेते हैं कपड़े. 

चीजें नक़ल उतारती हैं हमारी 
मगर हमारा अंत होगा 
उनकी नक़ल उतारते हुए. 
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राबर्तो ख़्वारोज़ राबर्तो ख्वारोज़ 

Monday, April 15, 2013

सिनान अन्तून की कविता

अमेरिका में रह रहे इराकी कवि सिनान अन्तून की एक और कविता... 

न्यूयार्क में एक तितली : सिनान अन्तून 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

बग़दाद के अपने बगीचे में 
मैं अक्सर भागा करता था उसके पीछे 
मगर वह उड़ कर दूर चली जाती थी हमेशा 
आज 
तीन दशकों बाद 
एक दूसरे महाद्वीप में 
वह आकर बैठ गई मेरे कंधे पर 
नीली 
समंदर के ख़यालों  
या आखिरी साँसें लेती किसी परी के आंसुओं की तरह 
उसके पर 
स्वर्ग से गिरती दो पत्तियाँ 
आज क्यों? 
क्या पता है उसे 
कि अब मैं नहीं भागा करता 
तितलियों के पीछे? 
सिर्फ देखा करता हूँ उन्हें खामोशी से 
कि बिता रहा हूँ ज़िंदगी 
एक टूटी हुई डाली की तरह 
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Sunday, April 14, 2013

अन्ना स्विर की कविता

अन्ना स्विर की एक और कविता... 









समुद्र और इंसान : अन्ना स्विर 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

तुम साध नहीं पाओगे इस समुद्र को 
विनम्रता या हर्षोन्माद से. 
मगर हँस सकते हो 
इसके मुंह पर. 

उन लोगों ने ईजाद की थी 
हँसी  
जो जीते हैं मुख़्तसर 
हँसी की एक बौछार की तरह. 

यह अंतहीन समुद्र 
कभी नहीं सीख पाएगा हँसना 
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