Friday, April 6, 2012

वेरा पावलोवा की नोटबुक से


रूसी कवियत्री वेरा पावलोवा की नोटबुक से...  















स्वर्ग वाचाल नहीं है : एक नोटबुक : वेरा पावलोवा 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मेरा लेखन: सख्त उबला. मेरी ज़िंदगी: मुलायम भुर्जी. 
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चिंतन की जुगाली: शाम तक दर्द करने लगते हैं मेरे जबड़े. 
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एक वयोवृद्ध कवि ने मुझे "दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत" कहकर पुकारा क्योंकि उन्हें मेरा नाम नहीं याद आ रहा था. 
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कुछ पल ऐसे होते हैं जब मुझे ब्रह्माण्ड फैलता हुआ सा लगता है. 
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मान्देल्स्ताम : "कविता सही होने की निश्चितता है."  ब्राडस्की : "कविता अनिश्चितता का स्कूल है." मेरा किसी दावे के प्रति कोई पक्का मत नहीं है. 
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-- माम, ९५ में ६० का गुणा करने पर क्या आएगा? 
-- लीज़ा, मैं एक कविता में व्यस्त हूँ नहीं तो तुम्हें इसका जवाब बता देती. 
-- और वह कितना होता? 
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कविता उसी तरह से लिखी जानी चाहिए जैसे परपुरुष या परस्त्री से सम्बन्ध बनाया जाता है: बचते हुए, छिपते हुए, ऐसे वक्फे में जिसका कोई हिसाब नहीं होता. और फिर आप इस तरह घर आईए जैसे कुछ हुआ ही न हो.  
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नदी में बहता हुआ लकड़ी का एक टुकड़ा चुन लो और अपनी निगाह से धारा में बहते उस टुकड़े का पीछा करते रहो, उसपर अपनी नजरें लगातार जमाए हुए, बिना धारा से आगे निकले. कविता इसी तरह से पढ़ी जानी चाहिए: एक पंक्ति की रफ़्तार से. 
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अपने मुंह में एक असमाप्त कविता लेकर बिस्तर पर चली गई और फिर चुम्बन नहीं ले पाई. 
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प्रेरणा: जब मैं अपने आप पर भरोसा करती हूँ. 
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-- अपने जीते जी मैं कभी श्रृंगार नहीं करूंगी लेकिन अंत्येष्टि के समय वे मुझे सजा देंगे! 
-- वसीयत में साफ़-साफ़ लिख देने पर वे ऐसा नहीं करेंगे. 
-- क्यों लिखूं मैं? करने दो उन्हें: ज़िंदगी में एक बार मैं खूबसूरत लगूंगी. 
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प्रथम अन्तरिक्ष यात्री यूरी गागरिन पर: उनका कुलनाम रूसी शब्द गागरा  से बना है जिसका मतलब होता है उड़ने में असमर्थ चिड़िया. 
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एक कविता को सेने के लिए मैं कुछ सामान लेने निकली. कैशियर को पैसे चुकता किए, फुटकर वापस लिया, घर लौटी मुकम्मल कविता और बगैर किसी सामान के. 
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मैं उन लोगों के बारे में कैसा महसूस करती हूँ जो मेरी कविता नहीं समझ पाते? मैं उन्हें समझती हूँ. 
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अख्मातोवा के आखिरी चिकित्सक की जीवनी से: उसकी मृत्यु उस समय हुई जब उसका कार्डियोग्राम लिया जा रहा था. उसकी मृत्यु एक सीधी रेखा के रूप में दर्ज हो चुकी है. रेडीमेड लाइनदार कागज़. आगे बढ़ो और लिखो. 
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"एक नवजात बच्ची के अंडाशय में ४००००० तक अंडाणु होते हैं." मेरी सारी कविताएँ पहले से ही मेरे भीतर हैं. 
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कविता तब शुरू होती है जब न केवल पाठक बल्कि लेखक को भी यह शंका होने लगे कि क्या यह कविता है. 
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दूसरों से ईर्ष्या न करना आसान है. जब वे आपसे ईर्ष्या कर रहे हों तब खुश न होना मुश्किल है. 
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पुश्किन के लिए मेरे प्यार में वैवाहिक जैसा कुछ है. 
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मेरी कोई भी कविता एक हथेली में समा जाएगी, और ज्यादातर कविताएँ किसी बच्चे की एक हथेली में. 
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कविता जितनी ही लम्बी होगी उसका यह असर उतना ही कमजोर होगा कि वह ऊपर से लिखवाई गई है. स्वर्ग वाचाल नहीं है. इसके अतिरिक्त आप जितनी ही बात करेंगे उतना ही झूठ बोलेंगे.  
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11 comments:

  1. बहुत प्रभावित करती हैं सभी कविताएं...खास कर..कविता उस तरह से लिखी जानी चाहिए जैसे परपुरुष या परस्त्री से सम्बन्ध बनाया जाता है: बचते हुए, छिपते हुए, ऐसे वक्फे में जिसका कोई हिसाब नहीं होता फिर आप इस तरह से घर आईए जैसे कुछ हुआ ही न हो । ......अद्भुत। ये सभी कविताएं कोई जी सकता है तभी लिख सकता है। वेरा पावलोवा के सामने तो दुनिया के कवि अब मुझे बस जुगाड़ू जज़र आरहे हैं...सच्ची कवियित्री को प्यार....

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  2. wonderful!!!
    Opening such notebooks is so refreshing and enriching experience!
    will wait for the next part of the series...

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  3. बड़ी गंभीर और गूढ बाते बताती हैं वेरा की ये पंक्तियाँ ! आभार मनोज जी ,इस मूल्यवान प्रस्तुति के लिए !

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  4. कल की चर्चा मंच पर

    मित्रों जरुर पढ़ें मनोज पटेल जी की

    यह दमदार प्रस्तुति ।

    (१)

    कविता होती तब शुरू, जब शंकित भवितव्य ।

    पाठक कवि के बीच में, सब कुछ हो शंकितव्य ।।

    (२)

    चार लाख अंडाणु को, रखती इक नवजात ।

    पहले से ही देह यह, मेरी कविता पात ।।

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  5. वाह... बेहतरीन. अगले हिस्से का इंतज़ार है.

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  6. गुरुवर के आदेश से , मंच रहा मैं साज ।
    निपटाने दिल्ली गये, एक जरुरी काज ।

    एक जरुरी काज, बधाई अग्रिम सादर ।
    मिले सफलता आज, सुनाएँ जल्दी आकर ।

    रविकर रहा पुकार, कृपा कर बंदापरवर ।
    अर्जी तेरे द्वार, सफल हों मेरे गुरुवर ।।

    शनिवार चर्चा मंच 842
    आपकी उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत की गई है |

    charcamanch.blogspot.com

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  7. जितनी प्रशंसा की जाय कम है....शानदार....आभार सर जी....!!

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  8. वाह वाह............................

    लगा पढते-पढते-पढते चले जाएँ.............................
    अनु

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  9. वाहहहहहहहह !!!!!!!!

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  10. अद्भुत कविताएं. बस
    मज़ा आ गया.

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