Sunday, July 8, 2012

चार्ल्स सिमिक की कविता

चार्ल्स सिमिक की एक और कविता...   

 
चार्ल्स सिमिक की कविता 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं रांगे से कहता हूँ 
क्यों पड़ने दिया तुमने खुद को 
एक गोली के भीतर? 
क्या तुम भूल चुके हो कीमियागरों को? 
सोने में बदलने की 
छोड़ चुके हो उम्मीद? 

कोई जवाब नहीं देता. 
रांगा. गोली. 
इस तरह के नामों के साथ 
लम्बी और गहरी होती है नींद. 
          :: :: :: 

3 comments:

  1. ...........इस तरह के नामों के साथ लंबी और गहरी होती है नींद !
    जो संवेदनशून्य और जड़ हो चुके हैं ,उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता ! वे आत्मविकास की सारी उम्मीदों को छोड़ चुके हैं !
    बहुत अर्थपूर्ण और गंभीर कविता ! आभार मनोज जी !

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...