Tuesday, June 5, 2012

बिली कालिन्स : साथ-साथ

बिली कालिंस की एक और कविता...   

साथ-साथ : बिली कालिन्स 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

चाहता हूँ कि तेज हो कैंची 
और बिल्कुल समतल हो मेज 
जब तुम काटो मुझे मेरी ज़िंदगी से 
और चिपकाओ उस किताब में जिसे हमेशा लिए रहती हो साथ-साथ. 
                    :: :: :: 


  1. अलग होने के बाद समय की कैंची से यादों को नहीं काटा जा सकता है.

  2. vinod kumar mishraJune 5, 2012 at 10:49 PM

    Even medical science says that a person starts losing his memory with growing age. But, ironically, my father aged about 76years likes to tell stories of how his grandmother pampered him. His memories of his early childhood are so vivid! This makes me feel that some memories are permanent. they do not even fade. Will anyone ever forget the tenderness of the first kiss from the opposite sex.

  3. .
    न होती है तुम्हारे तर्कों की कैंची तेज़ ,
    न ज़िंदगी की मेज़ इतनी समतल ,
    हरबार तुम जब मुझे काटती हो
    ज़िंदगी से
    पूरा कट नही पाता !

    बहुत अच्छी कविता ,मनोज जी ! आभार !


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