Wednesday, February 1, 2012

लैंग्स्टन ह्यूज : नीग्रो

लैंग्स्टन ह्यूज की एक कविता... 










नीग्रो : लैंग्स्टन ह्यूज 
(अनुवाद : मनोज पटेल) 

मैं नीग्रो हूँ : 
     रात जितना काला, 
     काला, अपने अफ्रीका की गहराइयों जैसा. 

गुलाम रहा हूँ मैं : 
     सीजर ने मुझसे अपनी चौखट साफ़ करवाई, 
     वाशिंगटन के जूते चमकाए मैनें. 

मजदूर रहा हूँ मैं : 
     मेरे ही हाथों ने खड़े किए पिरामिड, 
     गारा-मिट्टी किया मैनें वूलवर्थ बिल्डिंग के लिए.   

गवैया रहा हूँ मैं : 
     अपने दुख भरे गीतों को मैं ले आया 
     अफ्रीका से जार्जिया तक. 
     रैगटाइम बनाया मैनें ही.  

पीड़ित रहा हूँ मैं : 
     बेल्जियनों ने मेरे हाथ काटे कांगो में, 
     मिसीसिपी में वे बेगुनाह मारते हैं मुझे अभी भी. 

नीग्रो हूँ मैं : 
     रात जितना काला, 
     काला, अपने अफ्रीका की गहराइयों जैसा. 
                    :: :: :: 
Manoj Patel Blog, padhte-padhte.blogspot.com 

8 comments:

  1. awesome poem, jesa k aam kar ke hota hain...

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  2. अश्वेतों की पूरी व्यथा-कथा, और वह भी इतने कम शब्दों में ! तमाम ज़ुल्मो-सितम के बावजूद अश्वेत खड़े हैं अपनी पूरी ताक़त और रचनात्मकता के साथ. अश्वेत होने पर गर्व के साथ.

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  3. मनोज जी कविता है या अपनों का पत्र पढ़ कर आँख भर आया

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  4. बहुत बहुत बढ़िया....बहुत बहुत शुक्रिया इस कविता तक हमें पहुचानें के लिए...

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  5. बहोत खुब.. और भी कविता पढ़ना चाहूँगा.. थैंक्स

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  6. बहुत खूब.. और भी कविताए पढ़ना चाहूँगा.. शुक्रिया ...

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